कुछ ख्वाब भर के आँखों की डिबिया में बंद किये बैठी हूँ मै, जाने कब ये पलकों के परदे खुल जाए ..और ये ख्वाब दुनिया को दिख जाएँ.......
मंगलवार, 22 जनवरी 2013
मंगलवार, 15 जनवरी 2013
शनिवार, 12 जनवरी 2013
बुधवार, 5 दिसंबर 2012
गुरुवार, 29 नवंबर 2012
आज रात के तकिये से
आज रात के तकिये से कुछ हिसाब उसे चुकाना था
नींद नयी नयी सी थी पर उसका ख्वाब वही पुराना था
उँगलियों में कोई दर्द छिपा था वो मुठी बांधें बैठी थी
किसी बात से खफा थी पलकें वो चुप्पी साधें लेटी थी
कितनी थपकी दी थी खुद को ,बार बार समझाती थी
उसे नींद है आ रही फिर भी उठ उठ बैठ वो जाती थी
झूठी तसल्ली के मौसम भी बरसे थे कई बार वहाँ
बिस्तर में बेचैनी भी मिलती थी अक्सर मुफ्त यहाँ
अनचाहे से ख्वाब को आँखों से अपनी मिटाना था ..
आज रात के तकिये से कुछ हिसाब उसे चुकाना था।।
प्रीती
शनिवार, 20 अक्टूबर 2012
मै परजीवी हू,परजीवी हू ,बस परजीवी हू मै!
परजीवी हू, परजीवी हू ,बस परजीवी हू मै!'
ना किसी काम की, ना किसी काज की
सौ मन आनाज मै खाती हू,
मै नीरीह बहुत ,लाचार बहुत
बस ऐसे ही जिए मै जाती हू...
मेरी रोटी रहम की है और
कपड़े मेरे किसी वहम के है
जब हाथ फैलाती हू तो मुझ
पर भी कुछ तो गुजरती है.....
मै परजीवी हू,परजीवी हू ,बस परजीवी हू मै!
मेरी चादर बहुत ही छोटी है
और सपने बहुत ही लम्बे है,
इस चादर में इन सपनो को
हां बहुत सी उलझन होती है...
मै हस्ती ही रहती हू हमेशा
पर दिल में कही कोई रोती है
मेह्नत पे बड़ा भरोसा था ,
पर लगता है किस्मत भी कुछ होती है
मै परजीवी हू,परजीवी हू ,बस परजीवी हू मै!
मांग मांग कर अब तक मैंने
इतनी बार क़त्ल किये है खुद के
जिन्दगी जैसे एक क़र्ज़ हो मुझ पर
इतने एहसान है मुझपे सबके....
हां कह दो तुम भी सवाल अपना
की मुझे शर्म नहीं क्यूँ आती है
सांसें मेरी क्यूँ चुल्लू भर पानी में
नहीं डूब मर जाती है.....
के क्यूँ मै परजीवी हू ? के क्यूँ मै परजीवी हू
मेरी आँखों में भी आंसू है
शर्मिंदगी मुझे भी होती है
जब दौड़ -दौड़ के इस रेस में
जीत कभी ना होती है!
हर बार कही कुछ कमी हो गयी
हर बार मै पीछे छुट गयी ,
कही किसी ने लूटा मुझको तो
कभी लकीरे रूठ गयी,
मै थक गयी हू, अब हार गयी हू
पर जीना मुझको अब भी होगा
किस्मत कितना भी हाथ छुड़ाए
मुझे फिर भी जिंदगी को पकड़ना होगा
मै फिर से लड़खड़ा के गिर जाती हू..
फिर से किसी की थपकी मांगू
फिर से किसी कन्धा चाहू ...
मै फिर परजीवी बन जाती हू
बस परजीवी ही रह जाती हू
मै परजीवी हू,परजीवी हू ,बस परजीवी हू मै!
...प्रीती
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