बुधवार, 23 जनवरी 2013

दरिया है आखों में फिर भी कोई ख्वाब जलता है ..


ये मंजर भी बड़ा ही दिलचस्प और नायाब है 
दरिया है आखों में फिर भी कोई ख्वाब जलता है ..

भूल तो गया उसका साया भी उसको यहाँ 
हैरानी की बात है,कोई है जो परछाई सा चलता है ...

किस्मतों  की साजिश होगी के यादाश्त गयी उनकी 
वरना गरीबो में भी कही कभी कोई राजा पलता है ...

मुस्तकिल खुशमिजाजी का न अफ़सोस कीजिये 
उसके चेहरे पर  भी रोज कुछ शाम सा ढलता है....

गिरता उन्हें देख भूल गये जोर से ठहाके लगाने वाले   
बचपन में गिरे थे कई बार तभी आज कदम संभलता है....

पत्थर से है हालात तो क्या कोशिश कर के देखेंगे  सुना है के इस जहाँ में आग से वो लोहा भी पिघलता है... 

तुम यूं ही न रहोगे सदा न हम रहेंगे ऐसे ही,
वक़्त ही तो एक ऐसा है जो सभी का बदलता है ....
प्रीती 

मंगलवार, 15 जनवरी 2013

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

आज रात के तकिये से


आज रात के तकिये से कुछ हिसाब उसे चुकाना था
नींद नयी नयी सी थी पर उसका ख्वाब वही पुराना था

उँगलियों में कोई दर्द छिपा था वो मुठी बांधें बैठी थी
किसी बात से खफा थी पलकें वो चुप्पी साधें लेटी थी

कितनी थपकी दी थी खुद को ,बार बार समझाती थी
उसे नींद है आ रही फिर भी उठ उठ बैठ वो जाती थी


झूठी तसल्ली के मौसम भी बरसे थे कई बार वहाँ
बिस्तर में बेचैनी भी मिलती थी अक्सर मुफ्त यहाँ

अनचाहे से ख्वाब को आँखों से अपनी मिटाना था ..
आज रात के तकिये से कुछ हिसाब उसे चुकाना था।।

प्रीती