मंगलवार, 19 मार्च 2013

तोहफा ......

तुम खामखाँ  तकल्लुफ्फ़ करते हो बोलने का
मै तुम्हारी ख़ामोशी से भी लफ्ज़ तोड़ लेती हूँ !!
ये रस्मो रिवाज दुनिया के खातिर रख संभाल  के 
मै जरा अपने नाम में बस तेरा नाम जोड़  लेती हूँ !!
मेरी खुसबू से तेरा पता क्यूँ मिले लोगों को भला
इन गद्दार साँसों से ही मै अपना रिश्ता तोड़ लेती हूँ !!
मत बदल तू , हर बार शहर मेरी यादों के डर से
मेरा तोहफा है तुझे,इस दफे मै ही शहर छोड़ देती हूँ !!
प्रीती


बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

अश्कों से भीगी वो चांदनी

अश्कों से भीगी वो चांदनी रात भर भिगोती रहीं
जागती रही कोई दो आँखें और ये दुनिया सोती रही !!

हाथों में हाथों को लेकर जब वो बैठे थे यही .
लब भी ना हिले थे और ना जाने कितनी बातें होती रही !!
अपनी अलग दुनिया, अपना अलग आसियाना
तुझे  देख कर खुद बखुद पलकों का झुक जाना !!
तेरे काँधे पे रख के सर  कितने ही ख्वाब पिरोती रही

पर क्या पता था कि शीशे से ये ख्वाब हमेशा टूट जाते है
अक्सर बेगाने अपने बनकर तुमसे सब कुछ लूट जाते है !!

वो रातें जो तुम्हे बिना बात के हँसना  सिखा  देती है
वो खवाब जो पलकों पे शामियाना बना लेती है!!

एक शख्स के चले भर जाने से कैसे रूठ जातें है
हम हसतें हसतें  रोते है, और रोते रोते मुस्कुराते है !!

और वो चांदनी इन ख्यालो से ऒस की बूंदें संजोती रही
जागती रही कोई दो आँखें और ये दुनिया सोती रही !!
प्रीती 

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

लेन देन

मैंने ख़ामोशी थोड़ी संजो रखी है , 
अल्फाजो से जी भर जाये 
तो थोड़ी मुझसे ले जाना ...
एक अदद तन्हाई भी थोड़ी ,बिखरी है उस कोने में 
खुशियाँ तुमको रास ना आये
तो थोड़ी मुझसे ले जाना .....
कुछ मोती कि लड़िया भी है उस माटी के मटके में
जब कभी आखें भर आये 
तो थोड़ी मुझसे ले जाना ......
रात हुई और तो जले बुझे है कुछ ख्वाब के जुगनूं आखों में 

जब नींद तुम्हे ना आने पाए

तो थोड़े मुझसे ले जाना ....
इक गोद का तकियाँ फटा पुराना कब से पड़ा हुआ यहाँ पर
कभी तुम्हारा दिल भर आये
तो ये तकियाँ मुझसे ले जाना ....
हां इक शर्त भी लेकिन सुनते जाओ ,खैरात नहीं है बाटी मैंने
ले जाना तुम ये सब कुछ मुझसे
बस अपने दो पल दे जाना ......
बस अपने दो पल दे जाना ......प्रीती

बुधवार, 23 जनवरी 2013

दरिया है आखों में फिर भी कोई ख्वाब जलता है ..


ये मंजर भी बड़ा ही दिलचस्प और नायाब है 
दरिया है आखों में फिर भी कोई ख्वाब जलता है ..

भूल तो गया उसका साया भी उसको यहाँ 
हैरानी की बात है,कोई है जो परछाई सा चलता है ...

किस्मतों  की साजिश होगी के यादाश्त गयी उनकी 
वरना गरीबो में भी कही कभी कोई राजा पलता है ...

मुस्तकिल खुशमिजाजी का न अफ़सोस कीजिये 
उसके चेहरे पर  भी रोज कुछ शाम सा ढलता है....

गिरता उन्हें देख भूल गये जोर से ठहाके लगाने वाले   
बचपन में गिरे थे कई बार तभी आज कदम संभलता है....

पत्थर से है हालात तो क्या कोशिश कर के देखेंगे  सुना है के इस जहाँ में आग से वो लोहा भी पिघलता है... 

तुम यूं ही न रहोगे सदा न हम रहेंगे ऐसे ही,
वक़्त ही तो एक ऐसा है जो सभी का बदलता है ....
प्रीती 

मंगलवार, 15 जनवरी 2013