गुरुवार, 20 अगस्त 2015

बेटियाँ ...

कुछ ख्वाबों का श्रंगार करने दो
मुझे जिंदगी से प्यार करने दो ......

रखना नहीं है वास्ता बड़ी इन इमारतों से 
कच्ची सड़क पर ही घर की मुझे तो पाँव रखने दो |

हाँ नहीं जाना मुझे किसी और  का घर बसाने  को 
बाबुल का आँगन ही  मुझे गुलजार करने दो|
मुर्दा सा नहीं है, इसकी भी ख्वाहिशे है बहुत 
मनमानी  मुझे भी तो हजार बार करने दो |

बांधों नहीं अभी तुम रिवाजों के दामन मे
मुझे भी तो कदम दहलीजों के पार रखने दो |

दिखा दूँगी एक दिन मै भी इस दुनिया को 
कम नहीं है बेटियाँ किसी से भी कभी 
उन्हे भी बस हौसलों की  उड़ान भरने दो |
प्रीती

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

कुछ तन्हा से ख्याल...

लहर चाहती है मिलना जिनसे 
बस वही किनारे नही मिलते 
बाकी मिलने को उससे सारे 
के सारे बवंडर चले आते है ....


तुम ना आओ, तनहा फिर ये शाम सही 
हम तक पहुचती तेरी ख़ामोशी का पैगाम सही 
पंहुचा देती है मुझ... तक जो सदा तेरी 
उन हवाओ के कर्जदार हुए जाते है ....


गूंजते थे जहा हँसी के ठहाके 
वही अदब से अब मुस्कुराते है 
देखते ही देखते कितने ही घर 
ओहदों में सने मकां हुए जाते है....

तमाम उम्र जलाते रहे जो 
साँसों को कागज की तरह 
रो -रो के आज बेटे वही
पिता को मुखाग्नि दिए जाते है....

चलो छोडो क्या रखा है इन बातों में 
बाते ही तो है आज के इस दौर में 
जिसे भूख लगने पे लोग खाते है 
औ प्यास लगने पे पिए चले जाते है .. preeti

शनिवार, 31 मई 2014

मर्दानगी या हैवानियत ...

तूने ही कोशिशे की और
 तुझसे ही ना संभाला गया
ये मर्दानगी का भूत क्यूँ
तुझसे ही निकाला ना गया
क्या यही है तुम्हारी मर्दानगी 

की खुद पे ही काबू नहीं
रौंद डाला मासूम बचपन को 
और तुमको शर्म भी नहीं
मै कहती हूँ  जला डालो
 खुद को तुम ही ज़िंदा
सारा समाज तुम्हारी
इस हरकत पर शर्मिंदा
पर तुम्हे कहा परवाह है किसी की
तुम्हे तो बस तबाही आती है
किसी मासूम की बर्बादी आती है|
कैसे मर्द हो तुम
नहीं तुम मर्द नहीं
तो तुम्हें क्या नाम दो
नहीं हिजड़ा कहके मै
हिजड़ो के नाम को
 कलंकित नही करुंगी
 वो मासूम जिदगियाँ
नही तबाह करते

इंसान कहलाने लायक
 तो तुम बिलकुल भी नहीं
तो क्या तुम्हे जानवर कहूँ  
नहीं जानवर भी इंसानों से बेहतर है
तो तुम्हे क्या नाम दू इसी पेशोपस में हूँ 
नहीं तुम नाम देने के  लायक नही हो
क्यु के नाम तो जीवन को देते है
और तुम जीवन नही हो मृत्यु हो
किसी और की नही स्वयं की मृत्यु
आदम और इंसानियत की मृत्यु
तो मै तुम्हे नाम देती हु मृत्यु........|
                                                            प्रीती 

शुक्रवार, 30 मई 2014

आदतन मजबूर !!!!



त’अज्जुब न कर मेरी मेरी नजाकत  पर तू
मै बेदर्द नदी हूँ वो, जो पत्थर भी काट दूँ !!


फजल का हमारी ये भी नमूना देखिये कि
आब-ए-चश्म उसकी बातों  में ही झांक लू !!

इफ़्फ़त के नाम पर बार- बार परखा मुझे
नाकस लोगो मै तुमसे अपना हिस्सा आज लूँ  !!

खैर ये बाते तो सिर्फ कहने के खातिर ही होती है
दो लफ्ज तेरे अत्फ़ के, औं मै हर ख़ुशी तुझसे बाट लूँ !!

तू इकबाल कर दे अगर  इखलास का अपने
बावरी मोरनी बन कर मै आज नाच लूँ !!
                                                                  प्रीती


( फजल= टैलेंट , आब-ए-चश्म = आसूं, इफ़्फ़त = सतीत्व, नाकस= घटिया, अत्फ़ = प्रेम ,  इख्लास = प्यार, इकबाल= इकरार, )





सोमवार, 16 दिसंबर 2013

रिवाज- ए- दुनिया...


जरा हौसला कर मैंने, 
जो कदम निकाला डेहरी  पर 
मेरे हिस्से की जमीं ही,
  मुझसे मुँह मोड़ लेती है|  

मै सोचती हु बेख़ौफ़ हो 
कही दूर उड़ जाउ एक दिन 
पर चिढ़कर किस्मत
मेरे ही पंखों को नोच देती है। 
 
मालूम नही मुझे के कैंसे, 
पहुँचू  मै अंजाम तलक 
जिन राहो को छोड़ती हूँ ,
दिशायें फिर वही मोड़ देती है। 
 
मुझे वो आसमान का
 नीला टुकड़ा भी नही दिखता 
रिवाज- ए- दुनिया मुझे  
चारदीवारी में समेट  देती है । प्रीती 

रविवार, 23 जून 2013

मेरा ही मिजाज !!!


 जाने कौन हूँ मै,मुझे जाने किसकी तलाश है 


लगता है मेरे ही हाथो में मेरे ही मुकद्दर की लाश है .... 


मेरे अल्फाज है ,मेरी जुबां में मेरी ही बोलियाँ भी 

मेरा साथ नहीं देती जाने क्यूँ खफा मेरी ही आवाज है ....


मेरी ही तस्वीर कोरी सी, मेरे ही साज अधूरे से 

जैसा मेरा कल था जाने क्यूँ वैसा ही मेरा आज है ....


आइना देखकर तो पहचाना न गया वो शख्स

मुझे अजनबी सा लगता, मेरा ही हर अंदाज है ...


जहीर भी है कई, जामिन भी मेरे इसी शहर में 

इतने लोगों में फिर भी गम़गुस्सार मेरा ही मिजाज है ..

प्रीती....