Thursday, December 31, 2015

नया क्या और क्या पुराना

एक कहानी वही पुरानी  गुजरा हुआ वही एक जमाना
 दरख्तों से झाकती वही दो आँखे   ख्वाब वही घायल सा उनमें पुराना 


वही बेघर परिंदे साख दर साख  और बिखरे हुए पीले पत्ते पतझड़ के

वही फुटपाथ पर सोती गरीबी  वही सर्द में कांपती साँसे

वो उधर आज भी भूखा सो गया  इधर फिर कोई बेआबरू हो गया

अनशन, मोमबत्तियां, भी वही  निर्भया, ज्योति, दामिनी भी वही

वतन की सूरत उतनी ही बदसूरत सी  किसान फिर भूखा ही मौत की नींद सो गया

बदला हुआ सा कुछ भी तो नहीं लगता  तो फिर नया क्या और क्या पुराना हो गया |||

1 comment:

  1. बेहतरीन प्रस्तुती, नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

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