Friday, March 23, 2012

wo dekho.....



वो चुप रहकर भी देखो अपनी बात रखता है 

मै चलती हू तो कोई कदम मेरे साथ रखता है,

यूँ ही नहीं मिलती सुबह की रौशनी सबको
कि जलता है सूरज खुद में आग रखता है,
बड़ा मगरूर होकर परिंदा उङ गया परिंदा लेकिन 
घरौंदे में अभी तक कोई उसकी राह तकता है,
शहर में हो गया फिर किसी का क़त्ल कल देखो 
मगर फिर भी शहर जाने कि कोई चाह रखता है ,
धुँआ उड़ा था लगी आग जल गयी फसल 
महीनो से वो केवल चूल्हे में राख रखता है,


 
कही ये राज न खुले कि वो नया है शहर में 
इसी दर से शहर सी अदाए साथ रखता है, 

पसीना आ रहा सोच उलझे बालो जैसी हो रही 

मगर ना प्यार से कोई इक बार हाथ रखता है,

यूँ तो हर कोई मालिक है मगर बस फर्क है इतना

किसी के  पास है पतझड़ तो कोई बहार साथ रखता है,

बड़ा मजबूर है इंसा के पड़ के प्यार में गुनाह 

करता है और ना वजह साथ रखता है ,

भले टूटे हो हज़ारों पर सायद इस बार पूरा हो

इसी चाहत में वो पलकों पे फिर से ख्वाब रखता है .........

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